सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

भास्वती सरस्वती प्रकरण –१० भास्वती सरस्वती -- जनमानससे धरातल पर



प्रकरण १० – ठीकठाक किया ०९-०८-२०१८
भास्वती सरस्वती -- जनमानससे धरातल पर
भारतवर्षको अब फिरसे समृद्ध होना है। अगली शताब्दियों और सहस्राब्दियोंपर हमारी दृष्टि होनी चाहिये। भारतीय संगीत सिखाते हुए गुरु अपने शिष्योंको सदा मंद्र स्वरका अभ्यास करवाते हैं - क्योंकि जो जितना मंद्र स्वरतक (निचले स्वर तक) पहुँच सकता है, उतना ही उसे ऊपरी तार सप्तकके स्वर लगानेमें सुविधा होती है।
इसी प्रकार हमने भी सरस्वतीका भूतकालीन इतिहास और वर्तमान देखा लेकिन भविष्य क्या कहता है? या यों कहें कि भूतकालके परिप्रेक्ष्यमें हम सरस्वतीके भविष्यको कैसा देखना चाहते हैं ?
सहस्त्रों वर्षोंपूर्व बहनेवाली वरदायिनि सरस्वती लगभग इपू 2000 में लुप्त हो गई और उसके किनारे बसे लोग इधर उधर बिखर गये। लेकिन जनमानसमें सरस्वतीका अस्तित्व बना रहा। जब हमारे दिमागमें ये बात डाली जाने लगी कि या तो सरस्वती कल्पित थी या फिर आक्रमणकारी आर्योंसे उसका कोई अपनत्व संभव नही था तो पहले तो हम भौंचक्के रह गये। यूरोपीय सिद्धान्तोंको प्रमाण माननेवाले भारतीय विद्वान इस नई थियरीको स्वीकारने लगे। फिर एक जागृतिकी लहर चली कि हमारा सरस्वतीके साथ जो भावनिक संबंध है, उसपर दूसरोंको संशय व्यक्त न करने दें। साथ ही यह भावना भी तीव्र हुई कि सरस्वतीको खोजें। ये दोनों दौर बीसवीं सदीमें चले। परन्तु हमारे कई विद्वानोंने आर्य आक्रमण सिद्धान्तको सही मानकर उसी आधारपर अगला कार्य भी आरंभ कर दिया था - यहाँतक कि हमारी स्कूली किताबोंमें यह बात बार बार लिखी व दोहराई गई कि आजके भारतवासी किसी कालके आक्रमणकारी थे जिन्होंने यहाँकी पुरातन जनजातियोंका विध्वंस किया । इस सिद्धान्तको माननेवाले अपने आपको प्रोग्रेसिव्ह कहने लगे और सरस्वतीकी स्मृतिको सँजोनेवालोंको दकियानूसी कहने लगे।
लेकिन काल अपनी गतिसे चलता है। बीसवीं सदका दौर बीत गया। इक्कीसवीं सदी आते आते विश्‍वभरमें मान्य हो गया कि हम भारतीय कहींसे नहीं आये बल्कि हजारों वर्षोंसे इसी भूमिपर पले बढे हैं। और हमारी संस्कृतिको विश्वगुरूकी उँचाईतक पहुँचाने वाली पुण्यसलिला थी सरस्वती नदी। इस प्रकार जिस जिसने सरस्वती नदी तथा सरस्वती सभ्यताकी खोजमें अपना योगदान दिया उनके परिश्रम सार्थक हुए।
यहाँ एक बार रुककर उनके प्रति अभिनंदन व कृतज्ञता व्यक्त करना उचित होगा।
सबसे पहले विलियम जोन्स और मॅक्समुलरका नाम लेना पडेगा क्योंकि उनके अध्ययनकी प्रेरणा चाहे जो रही हो और उनके मतोंका फल चाहे जो भी निकला हो, परन्तु जिस लगन व परिश्रमसे उन्होंने भारतीय भाषाएँ या संस्कृत या वैदिक सभ्यताकी पढाई करी, उस लगनकी प्रशंसा तो करनी ही पडेगी। फिर नाम आते हैं, कनिंगहम, मॅकेडोनल और कीथके जिन्होंने अपने अपने सर्वेक्षणोंसे सरस्वतीपर बहुत कुछ प्रकाश डाला।
भारतीय विद्वानोंमें सबसे पुराना नाम आता है नाशिकमें जज रहे श्री तेलंगका जिन्होंने अंगरेजोंद्वारा फैलाये जा रहे इस मतका जोरदार खण्डन किया कि वैदिक संस्कृती मात्र ३५०० वर्ष पुरानी थी और महाभारतकी रचना सन् ५०० से ८०० के बीच हुई। उन्होंने महाभारतको आजसे लगभग ५००० वर्ष पुरातन सिद्ध करते हुए रामायण तथा वैदिक कालको उससे भी पुरातन बताया। फिर लोकमान्य तिलकने भी अन्य प्रमाणोंसे इसकी पुष्टि की।
उसके बाद ऋग्वेद आदि ग्रंथोंमें सरस्वती-वर्णनका विषय लेकर कई पुस्तकें लिखी गईं जिनमें काशी विश्वविद्यालयके श्री गोडबोलेकी पुस्तक ऋग्वेदमें सरस्वती विशेष रूपसे महत्वपूर्ण है। इसी दौरान श्रीनिवास रघुनाथने फिर एक बार महाभारतके अस्तित्वके प्रमाण व कालका निर्णय दिये।
स्वतंत्रता प्राप्तिके बाद विशेष रूपसे ASI (Archaeological Survay of India) अर्थात् पुरातत्व विशेषज्ञोंने और आगे चलकर उनकी खुदाईमें सहायक बने ONGC ने सरस्वतीकी खोज संबंधित बडा योगदान दिया है। इसी प्रकार सर्वे ऑफ इंडिया तथा जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडियाका योगदान भी महत्वपूर्ण है। इसी क्रममें आपटे स्मारक समिति बंगळुरु, उनके चलाये इतिहास संकलन समितीके कार्याध्यक्ष श्री पिंगळे और उनकी आयोजित शोधयात्राके नेता वाकणकर समेत सभी दस सदस्योंका योगदान अत्यधिक रहा । इसी समितीके इतिहास संकलनके कार्यको आगे बढानेवाले सरस्वती शोध प्रकल्पके निदेशक श्री कल्याणरामनने सात खण्डोंमें सरस्वती संबंधी ग्रंथरचना कर उससे जुडी भारतीय भावनाओंका अत्युच्च प्रदर्शन किया। शोध अभियान समितिकी पुस्तक "लुप्त सरस्वती नदी शोधयात्रा" के प्रकाशित होनेके बाद तो विशेष रूपसे माँग होने लगी कि क्यों न ऐसे प्रयत्न किये जायें जिससे सरस्वतीकी धारा फिरसे बहे । ऐसी माँग उठानेवालोंमें श्री दर्शनलाल जैन व उनके सहयोगियोंकी बडी भूमिका रही। जिन लेखकोंके कारण सरस्वती सभ्यताकी बात दूर-दूरतक पहुँची उनमें श्री कल्याणरामन, नटवर झा, नरहरि आचार, रवींद्र पराशर, श्रीकांत तलगेरी, राजाराम आदि कुछ नाम तत्काल सामने आते हैं। उपग्रहसे आये मानचित्रोंके अध्ययन करने वाले यशपाल इत्यादि विशेषज्ञोंने जब बताया कि सनातन सरस्वतीका मार्ग कैसा था, तब तो यह संभावना भी कई गुना बढी कि उसी मार्गकी खुदाईसे सरस्वतीका पुनर्भरण संपन्न हो सकेगा।
तो प्रश्न उठता है कि अब आगे क्या और उत्तर उभरता है जनमानससे ही। अब यह चाह बढने लगी कि क्यों न सरस्वती पुन: प्रवाहित हो? पहलेकी तरह फिर एक बार हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गुजरातको आप्लावित करे? क्यों न भविष्यमें हम फिर उस देवितमा, अंबितमा, नदीतमाका दर्शन करें जो सुदूर भूतकालमें कभी लुप्त हुई थी ?

लेकिन ऐसा हुआ तो भारतीयोंके लिये एक चुनौती यह भी होगी कि उस पुरातन सरस्वती-संस्कृतिकी तरह फिर एकबार भारतियोंमें ज्ञान व जिज्ञासा, शोध व कर्मठताका उदय हो जो आज लुप्तप्रायसा लगता है।
बीसवीं सदीकी सरस्वती शोधयात्राकी जगह अब इक्कीसवीं सदीमें जनमानसने माँगा कि सरस्वती अब धरातल पर भी उतरे। क्या यह संभव है ?
नदीका पुनर्भरण, एक प्रकारसे गोदभराई क्यों संभव नही? अब तो उपग्रह चित्रोंसे हमे पता है कि भूपृष्ठके नीचे सरस्वती किस रास्तेसे बहती थी। उस रास्तेपर उपर-उपरसे भले ही बालू, मिट्टी, कंकड जमा हुए हों, लेकिन कभी तो वही सरस्वतीका विशाल पात्र था। तो यदि सरस्वतीके मार्गको खोदा जाय, उसमें पडी कंकड-पत्थरोंकी परतें हटाई जायें, तो क्या पुन: सरस्वतीके दर्शन नही हो सकते हैं?
यह सोच प्रबल हुई तो हरयाणा व राजस्थानमें सरस्वती विकास व सरस्वतीके पुनर्भरणके उद्देशसे संस्थाएँ बनीं, बोर्ड बनें। खुदाई होने लगी ताकि नदीका पुराना पात्र स्वच्छ हो, फिरसे प्रवाहित हो।
यहाँ एक सतर्कताका विचार रखना भी आवश्यक है। उपग्रह-चित्र बताते हैं कि जमीनके गहरे अंदर सरस्वतीके पात्रमें कई जगहोंपर पानी भी है। उसे ड्रिलिंगके द्वारा उलीच कर जमीनके उपर लाना सही प्रयास नही होगा । मान्यताके अनुसार वह भूमिके अंदर- अंदरसे अग्निको ले जानेवाली धारा है। उसे छेडना ठीक नही। भूतलपर आकाशसे गिरते हुए जलसे और हिमालयकी बर्फकी धारासे ही सरस्वतीका पुनर्भरण विवेकपूर्ण होगा।
थोडे कालके लिये ही सही और थोडे मार्गपर ही सही, लेकिन वर्ष २०१७ की बारिशमें सरस्वतीमें जल प्रवाहित हुआ। यह प्रवाह कई तरहसे शुभारंभका प्रतीक है। खासकर नदीगत परिवहन व सुजलाम् भूमिके लिये। "या कुन्देन्दु तुषार हार धवला”, ऐसी सरस्वतीको फिरसे प्रवाहित करनेका कौशल भारतियोंने दिखाया तो हमारे गौरवशाली अतीतकी तरह भविष्य भी गौरवशाली होगा।
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