शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

पठामि संस्कृतम् २२३ नटखट ढब्बूजीके गीत Pathami Sanskritam 223 Dhabbuji



ओ ढब्बूजी तुम क्या खाते जी
मैं तो खाऊँगा चनाजोरगरम
और कचौरी और आईस्क्रीम
ओ ढब्बूजी तुम क्या खाते जी
मैं तो खाऊँगा लड्डू और बर्फी
या फिर खाऊँगा ठंडी ठंडी कुल्फी

भो ढब्बूजी त्वम् किं खादिष्यसि
खादिष्याम्यहम् चनाजोरगरमम्
एवं कचौरीं च आईस्क्रीमम्
भो ढब्बूजी त्वम् किं खादिष्यसि
खादिष्याम्यहम् लड्डून् वा बर्फीम्
अथवा प्रियामेकां शीतां कुल्फीम्

ओ ढब्बूजी तुम क्या देखते जी
मैं तो देखूँगा रंगबिरंगे फूल
गाते पंछी और हरी हरी घास
ओ ढब्बूजी तुम क्या देखते जी
मैं तो देखूँगा उजला उजला चाँद
काले काले बादल नीला आकाश

भो  ढब्बूजी त्वम् किं पश्यसि
बहूनि पश्यामि पुष्पाणि अहम्
गायन्तान् खगान्  हरितम् ग्रासम्
भो  ढब्बूजी त्वम् किं पश्यसि
पश्यामि अहम् चंद्रमसं शुभ्रम्
श्यामलान् मेघान् नीलं आकाशम्

ओ ढब्बूजी तुम क्या पढते जी
मैं तो पढूँगा कखगघङ
अआइई और क्षत्रज्ञ
ओ ढब्बूजी तुम क्या पढते जी
मैं तो पढूँगा  एक दो तीन चार
पाँच छ- सात आठ नौ और दस

भो  ढब्बूजी त्वम् किं पठसि
पठिष्यामि अक्षरान् कखगघङ
अआइई एवं क्षत्रज्ञ
भो  ढब्बूजी त्वम् किं पठसि
एकं द्वे त्रीणि चत्वारि पंच
षट् सप्त अष्ट नव च दश

ओ ढब्बूजी तुम कहाँ बैठते जी
मैं तो बैठूँगा दादीजीकी गोदमें
झूला झूलूँगा झूलनकुर्सीमें
ओ ढब्बूजी तुम कहाँ बैठते जी
मैं तो बैठूँगा दादीजीकी  पीठपर
दादी बोलेगी ये है बोरी भरके शक्कर

भो  ढब्बूजी कुत्र उपविश्यसि
 मातामह्यंके उपविश्याम्यहम्
हिंदोला  हिंदोला दोलयाम्यहम्
भो  ढब्बूजी कुत्र उपविश्यसि
 मातामह्याः पृष्ठे उपविश्याम्यहम्
सा कथयति शर्करा इयम्

ओ ढब्बूजी तुम क्या  करते जी
मैं तो कूदूँगा धप्पधपाधप
खीर खाऊँगा गप्पगपागप
ओ ढब्बूजी तुम क्या  करते जी
मैं तो दौडूँगा भैयासे आगे
दादीजी मेरे पीछे पीछे भागे।

भो  ढब्बूजी त्वम् किं करोसि
कूर्दिष्याम्यहम् धप्पधपाधप
क्षीरं खादिष्यामि गप्पगपागप
भो  ढब्बूजी त्वम् किं करोसि
अग्रजैरग्रे धाविष्याम्यहम्
मातामही धाविष्यति पृष्ठतो मह्यम्







































































कोई टिप्पणी नहीं: